Wednesday, 25 July 2012

Baby : G.M.Donald.


Where did you come from,baby dear? Out of the everywhere into here. Where did you get those eyes so blue? Out of the sky as I came through. What makes the light in them sparkle and spin? Some of the starry spikes left in. Where did you get that little tear? I found it waiting when I got here. What makes your forehead so smooth and high? A soft hand stroked it as I went by. What makes your cheek like a warm white rose? I saw something better than anyone knows. Whence that three -cornered smiles and bliss? Three angels gave me at once a kiss. Where did you get this pearly ear? God spoke, and it came out to hear. Where did you get those arms and hands? Love made itself into bonds and bands. Feet whence did you come,you darling things? From the same box as the cherub's wings. How did they all just come to be you? God thought about me,and so I grew. But, how did you come to us,you dear? God thought about you,and so I am here.

Wednesday, 30 May 2012

Selected songs of Vidyapati

गोसाउनिक गीत (विद्यापति विरचित):- जय जय भैरवि असुर भयाउनि पशुपति भामिनि माया सहज सुमति वर दिअ हे गोसाउनि अनुगत गति तुअ पाया। वासर रयनि शवासन शोभित चरण चन्द्रमणि चूड़ा कतओक दैत्य मारि मुख मेललि कतओ उगिलि कैल कूड़ा । सामर वरण नयन अनुरंजित जलद योग फुल कोका कट कट विकट ओठ फुट पाँड़ड़ि लिधुर फेन उठि फोका । घन घन घनन घुघुरु कत बाजय हन हन कर तुअ काता विद्यापति कवि तुअ पद सेवक पुत्र बिसरु जनि माता । Translated in English verse by Dr. Chandramani (From the book 'Selected songs of Vidyapati) * * * * * * Glory to the Goddess terrible to the devils Lord Shiva's conjuration Bless me mother with natural devotion Mount me to liberation. Day and night standing on a corpse Lord is lying under feet Chewing the demons and throwing out gives them sweepings treat. Your red eyes on the blackish body Lotuses in the sky Quivering lips have blooded bubbles looking at you devils cry. Shining sword is making a sound with hundred feet-bells 'Vidyapati is son devoted mother!don't forget. (2) चन्दा जनि उगु आजुक राति ! पियाके लिखिअ पठायब पाँति । साओन सँ हम करब पिरीत जत अभिमत अभिसारक रीत । अथवा राहु बुझायब हाँसी पीबि जनि उगिलह शीतल शशि। कोटि रतन जलधर तोहेँ लेह आजुक रयनि घनतम कय देह । भनहि विद्यापति शुभ अभिसार भल जन करथि परक उपकार । * * * * * Oh moon! don't rise tonight. A letter to dear I will right. I shall be loving the rainy season Where is the meeting tradition. Or, satellite will be requested You will be drunken rising objected. Take away all my ornaments glory Make the night darkest and cloudy. Vidyapati hints for good interaction Good man knows all without explanation. Translated by Dr. Chandramani.

Thursday, 5 April 2012

ये हुई न बात ....गज़ल....डा0 चन्द्रमणि.

बसता मेरी निगाह मे शाकी का चेहरा
अबकी जो देखा मुसकुरा के ये हुई न बात।
अनकही अदा ने बयाँ कर दी बहुत कुछ
दाँतों में ऊँगलियाँ दबाके ये हुई न बात।
सपनों की मल्लिका के ख़यालों में जो भी था
उनकी तो आँखें मुझसे लड़ी़ ये हुई न बात।
उनकी जुबाँ थी बन्द मैं भी बोल न सका
लम्बी खींची थीं साँसें उनकी ये हुई न बात।
हर चार कदम चलके दुपट्टा संभालती
बौराई हवा छेड़ गई ये हुई न बात।
वो जा रही थी जैसे मुझे जानती नहीं
झटके से मुड़के देख लिया ये हुई न बात।
कुछ शुक्र है ख़ुदा का सुकूँ मुझको भी मिला
चाहत ने चाहा 'चन्द्रमणि' ये हुई न बात ।।
डा0 चन्द्रमणि.

Monday, 2 April 2012

पियाजी सयान डा0चन्द्रमणि

हमरो वारी उमेरिया पिया बड़ा रे सयान
हम त' लाजे भेलौं कठौत पिया मारय नैन वाण ।
बाबाक अंगना मे बेली फुलयलइ
नचिते गबिते भमरा अयलइ
लागि गेलइ पहरा पिया कप्तान..हमरो वारी...
अम्माक अंगना मे हम त' खेललियइ
प्रेमक मंतर किछु ने जनलियइ
हृदय लगाय पिया मारय मुसकान..हमरो वारी...
पड़िते सेनुर कोना पलटल पाशा
छलियइ धिया पुता भेलियइ तमाशा
पियाजीक पिंजड़ा मे सुगियाक जान..हमरो..
कोरा कागत हम बपदुलरी
पीअर दप दप हमरोके चुनरी
लागि गेल दाग पिया खाय मोर पान..
हमरो वारी उमेरिया पिया बड़ा रे सयान ।।
( ई गीत मुजप्फरपुर दूरदर्शन सं चन्द्रेश्वर गायक के आवाज मे
दर्जनो बेर प्रसारित भेल अछि।गीतक अर्थ प्रेम सं लगाओल जाय, हड़बड़ी मे नहि)

हम गुलाब केर फूल डा0 चन्द्रमणि

हम वसंत ऋतु अहाँ पवन बनि आउ ने
हम गुलाब केर फूल पिया दुलराउ ने ।
छी दूर जाय बैसल पागल बनल यै मौसम
पढ़लौं ने प्रेम आखर त' सब बेकार प्रीतम
अर्थक जोड़ घटाउ छोड़ि घर आउ ने...हम गुलाब केर फूल...
बेदर्द छइ जमाना ने प्रीत रीत जानय
दोसर के नीक धन के बरबस अपनहि मानय
छी सुकुमारि सिनेह सुधा बरिसाउ ने...हम गुलाब केर फूल..
खुलिके हँसइ छी कनिये होइते रहैये मोसकिल
की भान करय भमरा अपने अहाँ छी काबिल
बनि प्रेमक बदरा बरसिये जाउ ने
हम गुलाब केर फूल पिया दुलराउ ने ।।
डा0 चन्द्रमणि.

Sunday, 1 April 2012

सीता शतक डा0 चन्द्रमणि.

सरस्वती वन्दना
कर वीणा पद्मासना सकल ज्ञान आगार
आदि शक्ति शुभदायिनी करिय नमन स्वीकार ।1।
गणेश वन्दना
जय गणेश गिरिजा तनय काव्य कला गुण धाम
सकल सिद्धि दाता प्रभु कोटि कोटि परनाम ।2।
शिव वन्दना
शशि शोभित जनि भाल पर सिर पर सुरसरि धार
कर त्रिशूल लय कष्ट हरू शिव करुणा अवतार ।3।
सीताराम वन्दना
जगदम्बा बनि जानकी मिथिला मे अवतार
राम रमापति "चन्द्रमणि" करु हमरहु भवपार ।4।
कथा
सिरमा मे गिरिराज अटल पदतल गंगाधार
बंग बाम गंडकी दहिन मिथिला मोक्षक द्वार।5।
पावन मिथिला देश मे निर्मित भेल अकाल
राज पुरोहित कहल तखन हर जोतथि महिपाल ।6।
जन गण केर दु:ख त्राण हित तत्पर जनक नरेश
हर सं जोतल खेत केँ हरलनि प्रजा कलेश ।7।
हर'क सिराउरि सँ प्रकट घट मे सीता अम्ब
बरिसल घन आनन्द केँ जयति जयति जगदम्ब ।8।
धन्य धरणि केर खणड ओ सीतामही विशेष
सीतामढ़ीक नाम सँ एखनहु नगर अशेष ।9।
घट केर आभा देखि केँ चकित सुनयना माय
झट सं शिशुकेँ कोर कय आँचर लेलनि समाय।10।
राक्षस कुल संहार हित अयला श्री भगवान
जनक सुता केर रूप सिया दशरथ सुत श्री राम।11।
जनम लेलनि जगदम्बिके मिथिला सन के आन
कुँज कुँज भरि गेल कुसुम सदा वसंत समान।12।
अवसर पुत्री जन्म केँ किंचित सुनइछ कान
हरखक पारावार नहि चहुँदिशि सोहर गान।13।
धन्य धन्य मिथिलापुरी धन्य जनकपुर धाम
जनक सुता पग पैजनी झंकृत वन पथ गाम।14।
सुखक समय गति तेज तेँ बीतल पलक समान
वर कनियां के खेल मे सीता भेलि सयान ।15।
पिता जनक ऋषि तुल्य गृह शिव धनु रहय जोगाय
नीपथि धनुतल नित्य सिया बामहि हाथ उठाय ।16।
नृप देखल ई दृश्य त' बड़ मन अचरज भेल
सीता केर पति होथि जे तोड़थि धनु व्रत लेल।17।
नंदन वन सन वाटिका सिया बहिनपा संग
गिरिजा पूजन हेतु सुमन तोड़थि रंग विरंग।18।
तखनहि अयला राम लखन अवसर बहुत विचारि
जनिक रूप छवि देखिकेँ हरखित सकल कुमारि।20।
राम मुग्ध सिय रूप पर सिया मुग्ध लखि राम
सुखक आगमन "चन्द्रमणि"फड़कनि वामा बाम।21।
मध्य नगर मिथिलेश के यज्ञभूमि निर्माण
शिवक धनुष भंजन करता जे अतिशय बलवान ।22।
टारि सकल नहि कत भंजन दस सहस्र नृप टोल
तोड़लनि शीश झुकाय धनुष रामक जय अनघोल।23।
सिया राम केँ पुनर्मिलन वरण कयल जयमाल
पुष्प वृष्टि कयलनि सुरगण दय दय नाँचथि ताल।24।
शेषासन केँ छोड़ि हरी अयला मिथिला द्वार
दीव्य भूमि पर विष्णु प्रिया स्वयं लेलनि अवतार।25।....क्रमश:......
डा0 चन्द्रमणि.

हे सजनी ! डा0 चन्द्रमणि

चोरी चोरी नैन नचाक' चुप्पा वाण चलाबइ छी
अंग अंग मे रंग सातटा पनिशोखा बनि आबइ छी
खने उगइ छी खने डुबइ छी कियै एना तरसाबइ छी हे सजनी....
अहाँ हँसइ छी कते तरेगण दोगे दोग नुकाइये
देखि अहाँके हमरा मन मे सिंगरहार छिड़िआइये
गुनगुनाइत छी पंचम सुर मे कोइली के भरमाबइ छी...खने उगइ छी..
दर्पण के जुनि देखू ओ त' अपनहि बहुत लजायल ये
देखू हमरे आँखि मे सजनी रूप अहींक समायल ये
कतेक दुलारू भेल दुपट्टा मुँह पोछि बहसाबइ छी ....खने उगइ छी..
एलइ वसंत अलि संग कंत छइ दुनिया ई रंगीन कते
अहूँ बुझइ छी मोने मोने हम करइत छी प्रेम जते
लाज छोड़िके बाँहि पसारू जिनगी कियै गमाबइ छी....खने उगइ छी..
डा0 चन्द्रमणि.

Saturday, 31 March 2012

बलमा शराबी डा0 चन्द्रमणि

बलमा भेलइ शराबी गे बहिना जरि गेल हमर कपार ।
प्रेम वचन कहियो ने सुनइ छी,
सुख सेनुर के किछु ने बुझइ छी
जिनगी कोनाके सम्हारी गे बहिना जरि गेल हमर कपार ।
आध पहर राति मे घर आबइ
बेहोशी मे हमरा जगाबइ
मोनक सेहन्ता पजारी गे बहिना जरि गेल हमर कपार ।
हमरा त' तिल तिल तरसाबइ
छाती सं बोतल के लगाबइ
नोरे भीजइये साड़ी गे बहिना जरि गेल हमर कपार ।
कोन जनम के तप चूक कयलौं
सोना सन तन माटि मिलयलउँ
दैव देलनि दु:ख भारी गे बहिना जरि गेल हमर कपार ।
डा0 चन्द्रमणि.

Thursday, 29 March 2012

षट्कोण. डा0 चन्द्रमणि.

निज राज-काज सं मतलब अछि बड़ नीक बात।
अप्पन बाड़ी-फुलवाड़ी संग
आंगन दलान मधुरिम बसात
के करत प्रश्न ?
पुरुखाक राज पएबाक हेतु
चाही संकुल संपूर्ण तंत्र
एकसर गुरुदेवहु छथि असक्क
आ' असहाय।
अछि गोलवृत्त सन सूर्य
ने कखनहु परिवर्तित
तेँ,शक्तिमान जीवनदाता।
आ'जकर गोलाई घटत बढत
खन हैत नतोदर उदरोन्नत
निज अस्तित्वहि पर अठबज्जर
नेंगराइत स्वयं चलि जैत
अमावश उदर मध्य।
तेँ छैक जरूरी
रहय वृत्त सदिखन अटूट
नहि टूट-फूट मंगलदायक
ई दु:खदायक।
छी देखि रहल-
जनकक संतति सबहक जुटान
बैसार भेल अछि गोल-गोल
मतभिन्न उदर सबहक दुगोल।
केओ छथि शीबू योगी सन
ई निर्विकार ओ भोगी सन
जे पाँडु, पड़ल छथि रोगी सन
बेटाक आस
छोड़थि निसास।
दू-दू टा भुज बिच अलग कोण
षट्कोण बनओलनि छ: टा जन
अप्पन मर्जी आ'अप्पन मन।
गति रहितनि रहितिथ गोलवृत्त
पग-पग पर बाधित भेलनि गति
बुझू दुर्गति।
जल अछि अथाह
नहि थाह कतहु सिंहासन केर
तैराक बिसरिके लक्ष्य
तकै छथि रेहु माँछ
पुच्छी में अगबे हैत काँट
स्वादहु कम्मे।
चाही सबकेँ बड़का मूड़ा
मन केर मनोरथ हो पूरा
दय रहल हथोरिया माँछ लेल
अनमोल खजाना बिसरि देल।
अछि यैह फर्क-
मैथिलजन आ'सेनाक बीच
जहिना नायक बिनु भीड़
कहाबैत'छि मेला
बस सैह थिकहुँ।
हमसब नहि छी भेड़िया धसान
विस्फोटित बम सन छितरायल
सबहक मुँह सबदिस बौरायल।
कतबहु अगुआ सेवथु मसान
धरना पेटकुनिया देल करथु
दुनिया ले' कहबथु महादेव
हमरा सबले' एहिना धनि सन।
मैथिल मनमऔजी रहल सदा
सेनापति सं भ'क' फराक
मनमत्त नाँच कय गरिथैया
सब फाँड़ बान्हि देखबैछ जोश
ओ कल्याणहि ओ मालकोश
मेला बिच गाओत अलग राग
जिनगी बीतल अछि खोंटि साग
मैथिल समाज!
आबहु त'जाग!!
आबहु त'जाग!!!

Wednesday, 21 March 2012

नव निर्माण करी । डा0 चन्द्रमणि.

नव निर्माण करी,नव निर्माण करी ।
आउ युवाजन!मिलिक' नूतन मिथिला केर निर्माण करी ।। नव निर्माण करी...
विश्व विजय कय सकी उड़ाबी बाधा-ब्याधि पहाड़
तम आसुरी प्रवृत्ति हटाबी हम शक्तिक भंडार
लक्ष्य साधि हम चलल पथिक छी बाट ने कोनो दुर्गम
ओजक ओजन नव उमंग ल' अनुप्राणित छी सदिखन
सुख-वैभव -मधु-आकर्षण सं विलग सतत् गतिमान रही ।नव निर्माण करी...
गउरव गरिमा सं ज्योतिर्मय मिथला केर इतिहास
सुखद भविष्यक निर्माणक हित अर्पित जीवन चास
एक मात्र अछि ध्येय हमर नव मिथिला केर निर्माण
बिनु शोषण उत्पीड़न के हो आजुक मधुर विहान
न्यायोचित अधिकार लेल हम सब संभव बलिदान करी ।नव निर्माण करी...
पूबा- पछिमा-दछिनाहा केर तजि संकुचित विचार
मिथिलावासी सब छी मैथिल क' ली अंगीकार
जातिवाद केर श्राद्ध क्रिया कय मिथिला मैथिल लेल लड़ी
भाषा मम् सबठाँ हो पूजित हम प्रयास एहि लेल करी
पैघ छोट आ' धनी गरीबक गणनाहुक अवशान करी । नव निर्माण करी...
डा0 चन्द्रमणि.

Thursday, 15 March 2012

Political abuse.

Dear! We elect our representatives.P.M. or C.M. rules the country or state on people's verdict.Rulers are the creations of public in democracy.Hence, we must not abuse our creations.It is sin.Yes,if we are not satisfied with our creations,we should be alert for better creation next time.Every step during manufacturing should be taken in the favour of our motherland.

Thursday, 23 February 2012

इन्द्रपरी

दीप'क की काज स्वयं दीप छी अहाँ,प्रिये इन्द्रपरियो सं नीक छी अहाँ।
बाट मे चलइ छी निज नयना झुकाय,अपरूप इ रूप देखि फूलो लजाय,
भागवन्त भमराक मीत छी अहाँ,प्रिये इन्द्रपरियो सं नीक छी अहाँ। दीप'क की..
कोन वर मांगइ ले मंदिर चलल,पूजाक अगर गुगुल गमगमा रहल,
प्रेम केर प्रतिमा पुनीत छी अहाँ,प्रिये इन्दरपरियो सं नीक छी अहाँ।दीप'क की..
मोनकेर बात गीत बनिक' चलल,कोइलीक गीत बोल कंठे रहल,
कृष्ण केर बाँसुरीक गीत छी अहाँ,प्रिये इन्द्रपरियो सं नीक छी अहाँ। दीप'क की..
एक दरस परस ले मलान भेल छी,कल्पना सं "चन्द्रणणि" उतान भेल छी,
बिनु परिचय जानल सन प्रीत छी अहाँ,प्रिये इन्द्रपरियो सं नीक छी अहाँ। दीप'क की काज..
डा0 चन्द्रमणि.

Sunday, 19 February 2012

शिवताण्डवस्तोत्रम् ।

अनुवाद :-डा0 चन्द्रमणि.
जटारूप अटवी वन निकसलि जाह्नवीक पावन धारा
गरदनि अवलम्बित फणिमाला ताण्डव नृत्य प्रचण्ड परा,
डिमिक डिमिक डिम डमरू बाजे स्वर लहरी अनुगुंज करे,
करु कल्याण हमर शिवशंकर जयशिव जयशिव हरे हरे।1।
जटा कड़ाही मध्य तरंगित गंग सुशोभित शीश जनिक,
धह-धह ज्वाल ललाटक मध्ये राजित बालक शोम तनिक,
शुचि शरीर सुन्दर शशि शेखर सदा हृदय अनुराग भरे
करु कल्याण हमर शिवशंकर जयशिव जयशिव हरे हरे।2।
धन-धन गिरि तनया विलास निर्लिप्त निरासक्ते योगी,
हुलसित लखि चहुँदिशि प्रकाश निज शिर-भूषण जन-उपयोगी,
सतत् कृपा दृग पाबि दिगम्बर कष्ट हरे आमोद भरे,
करु कल्याण हमर शिव शंकर जयशिव जयशिव हरे-हरे ।3।
जटाजूट आवर्तित फणि-मणि कुंकुम रागालेप प्रभा,
आलोकित चहुँ दिशा हस्ति चर्माम्बर पहिरन हरक सदा,
ताहि विलक्षण भूतनाथ मे मन विनोद सदिकाल करे,
करु कल्याण हमर शिव शंकर जयशिव जयशिव हरे हरे।4।
इन्द्रादिक मस्तक आवर्तित पुष्प पराग चरण पनही,
नागराज केर हार निबद्धित जटा शिखर शशि टा धनही,
चिर संपत्ति घटय नहि कहियो रिक्त हमर भंडार भरे,
करु कल्याण हमर शिव शंकर जयशिव जयशिव हरे-हरे ।5।
अग्नि प्रज्वलित भालक वेदी मन्मथ शमन तेज सं भेल,
भाल विशाल कलाधर शोभित छथि आराध्य इन्द्रहुक लेल,
मस्तक महाजटिल शिवशंभुक मम अभिष्ट श्री सिद्ध करे,
करु कल्याण हमर शिवशंकर जयशिव जयशिव हरे हरे ।6।
धह धह अनल भाल विकराले कयल कामदेवहुक हवन,
गिरितनया-कुच पत्रभंग रचना कारीगर शिवा रमण,
अटल भक्ति एकाग्रचित्त हो तीन नयन मे ध्यान धरे,
करु कल्याण हमर शिव शंकर जयशिव जयशिव हरे हरे ।7।
अमारात्रि केर नवल मेघमाला सन कारी कण्ठ जनिक,
हस्तिचर्म धारक तारक विश्वेश गंगपति चन्द्रमणिक,
परम मनोहर कान्तिवान भगवान धनक विस्तार करे,
करु कल्याण हमर शिव शंकर जयशिव जयशिव हरे हरे।8।
नील कमल दल श्याम प्रभा अनुगमना हरिणी-छवि ग्रीवा,
त्रिपुर काम भव दक्ष यक्ष हरि अन्धक यम हति देव-शिवा,
विघ्न विनाशक पिता महादेव सकल ताप परिताप हरे,
करु कल्याण हमर शिवशंकर जयशिव जयशिव हरे हरे।9।
दंभ रहित गिरिजाक मधुप जे कला कदम्ब मंजरी पान,
दक्ष यक्ष हरि यम भव अन्तक मन्मथ त्रिपुर असुर अवशान,
महादेव मम कष्ट विनाशक दिवा राति मन भजन करे,
करु कल्याण हमर शिवशंकर जयशिव जयशिव हरे हरे।10।
सिर भुजंग फुफकार वेग सं अनल ललाट धधकि रहलइ,
शिव प्रचणड ताण्डव आलोकित धिमि धिमि नाद धमकि रहलइ,
गुंजित मंगल घोष चहुँदिशि मंगल मंगल सदा करे,
करु कल्याण हमर शिवशंकर जयशिव जयशिव हरे हरे।11।
पाथरवत् पुनि कोमल सेजे साँप आर मुक्ता माला,
रत्न माँटि मित शत्रु अभेदे दुर्वादल अक्षी-कमला,
प्रजा आर पृथ्वीपति में समभाव राखि मन जपन करे,
करु कल्याण हमर शिवशंकर जयशिव जयशिव हरे हरे।12।
ललित ललाट भाल चन्दा मे सदिखन स्थिर चित्त रहय,
सुरसरि तट करजोरि भाव निर्मल मन शिव केँ जाप करय,
सजल नेत्र शिव चरण कमल मे पल पल छिन छिन नमन करे,
करु कल्याण हमर शिवशंकर जयशिव जयशिव हरे हरे ।13।
अति उत्तम स्तोत्रक वर्णन पाठ नित्य स्मरण करय,
शिवगुरु भक्ति मिलय तहि जन केँ नहि विलोम गति लेश रहय,
गिरिजापति पद भक्ति अहर्निश भवबंधन सं मुक्त करे,
करु कल्याण हमर शिव शंकर जयशिव जयशिव हरे हरे ।14।
इति पूजा संध्याकाले दसकंधर पठितक पाठ करे,
धन सुत गज रथ पाबि 'चन्द्रमणि' संतानक सुख-ठाठ रहे अटल भक्ति सं अचल संपदा भक्तजनक भंडार भरे,
करु कल्याण हमर शिवशंकर जयशिव जयशिव हरे हरे ।15।
अनुवादक: डा0 चन्द्रमणि.

Friday, 17 February 2012

राक्षस.

मनुख जकरा जननीक त्यागक ज्ञान नहि हो,
मनुख जकरा जन्मभूमिक प्रति मान नहि हो,
मनुख जकरा पिताक प्रति सम्मान नहि हो,
मनुख जकरा संतानक प्रति सिनेह नहि हो,
मनुख जकरा आन्तरिक विवेक नहि हो,
मनुख जकरा अपना धन सं संतोष नहि हो,
मनुख जकरा नीक बेजायक होश नहि हो,
मनुख जकरा कृतज्ञताक भाव नहि हो,
मनुख जकरा पर सत्यक प्रभाव नहि हो
मनुख जकरा बातक ब्यवस्था नहि हो,
मनुख जकरा ईश्वर मे आस्था नहि हो-----राक्षस थीक।

Monday, 13 February 2012

भिलेन्स डे ।

चौदह फरवरीक लगीच अबिते
मोन पड़ल भगलुआक भागब
पड़ोशी गामक समगोत्री छौड़ी संग।
छौड़ी मायक गहना आ'
छौड़ा बापक बटुआ बटोरिक'
भागल रहय पटना,
ई रहय गामक भड़ पैघ घटना।
लभेरिया सं ग्रस्त,
डरे अस्तब्यस्त,
धरा गेल दुनु,
पकड़ा गेल पुलिस सं।
दू थापर मे छौड़ा आ'
भय सं छौड़ी फोलि देलक पोल,
दलमलित भेल गामघर सगरो अनघोल।
औ बाबू!छौड़ा बयान देलक
अनसोहाँत सन,
दहीमे दाँत सन।
सुनने रहियै मदर्स डे/फादर्स डे,
धनिकहा सबहक बर्थ डे।
ई भोगिया त'भागल रहय
मनाब'ले' भिलेन्स डे....?

Saturday, 11 February 2012

ठुमरी.

सजनवा,सात समन्दर पार ।
कौनसे कारण देश छोड़ गये सूना है घरवार।
उपवन कूक रही कोयलिया,दौड़ रही ये चंचल नदिया,
पुरबैया करती किलोल है पानेको अधिकार। सजनवा...
तन पिंजड़ा खाली बिन पंछी,बिन सजना ये काजल बिंदी,
ये गेसू ये गजरा रोये ,रोये मोतिम हार। सजनवा....
मेरे घर आके तो देखे,इतना धन है कौन समेटे,
भरूँगी खाली दुनिया उनकी,इतना दूँगी प्यार।सजनवा...
डा0चन्द्रमणि.

Saturday, 4 February 2012

कछमछाइत लोक

कछमछाइत लोक
डा0 चन्द्रमणि.
दीर्घ चाण्डाल रौद सं दगधल मनुख
पाबि सकलैये छाहरि
भूमिगत मनुख सब निकलल
पसरल अछि जहाँ-तहाँ
जेना पथारक छिड़आयल राहड़ि।
पओलक अछि जगह छिड़अयबाक
आ’ संगहि उग्रास।
पापक तापसं रौद कोनो कम छल
रब्बीके दाउन करैत बड़द जकाँ
लोको बेदम्म छल।
बड़दक हिस्साक भूस्सा
बेचैत अछि बटेदार
पीबैत अछि ताड़ी,
आ’ मनुख त’ मनुखेक
खाइछ हिस्सेदारी।
कछमछाइत लोक
श्रम केर मूल्य ताकैये
जगलैये चेतना
चौक-चौराहा पर
मुँह फोलि बाजैये।
दर्द के भोगनिहार भोगी
बुझैत अछि आब
की थिक परिवर्तन
आ’ की थिक विकास।
सभाक भीड़मे घुसिआइत अछि
भाषण सुनैत अछि
गुनैत अछि अपनो जे
के खाइत अछि ओकर हिस्सा ?
कियै बजैत अछि लोक
भ्रष्टाचारक खिस्सा।
भोगियोके नाम पर उठल छै पैसा
बरखो पहिने।
मुँह चुप्प करबाक भेटल रहै फीस
गमछामे चारि सेर गहूम
आ’ एक चौथाइ टाका
घर रहबे नहि करइ
भेल रहै फाका।
मनरेगाक लेबर मे
नाम छैक एकरो
लाभ एकरा कहाँ
भेटल रहै ककरो।
भेटै छै अन्न आब
कैंचा किछु काज ले’
ब्याकुल छल भोगी
सुखमय सुराज ले’।
भीड़ सं फराक भोगी
अतीतकेँ सोचैत अछि
गाँधीक नाम पर
की की ने होइत अछि।
खाइत अछि कुकुर
दोख लागै गिरथाइन के
निम्मन छै बन्न रहौ
चुलहा हलुआइन के।
इन्दिरा आवास ओह!
मनरेगा आह!
छोड़िके बिहार बन्धु आर कतहु जाह।
छटपटाइत अछि बिहार
भ्रष्टमुक्त होयबा ले’
ब्याकुल छह
सूइया मे फाड़ जगह पएबा ले’।
भुन्ना आ’ भाकुर सब
गलफर भरैत अछि,
राजा इमानदार चेफड़ी सटैत अछि।

Saturday, 28 January 2012

दुबका सा कल

आया वसंत भमरे गुन-गुन
दुबका सा कल रोया गुमसुम।
बस,दृष्टि मिली पथ नहीं मिला
यह पौद बाग का नहीं खिला ।
प्राची में दिनकर नित्य उगे
नभ चढे धरा पर नहीं झुके ।
बटवृक्ष खड़ा यह बड़ा बड़ा
इसकी छाया में पौद पड़ा ।
रवि-रशमि को शिशु रोता ही रहा
तरू की छाया से ढका रहा ।
सिर पर वट तरू तो खैर कहां
नभ दूर यहाँ रवि दूर वहाँ।
पा नहीं सका ऊर्जा यह पौद
इसको तो कोई गया रौद।
यह बागवान की चूक भी है
ऊपर तकने की भूख भी है।
सिर झुका देखता नींचा जो
दम तोड़ नहीं रहता यह तो।
कल की भी परख आवश्यक है
आजादी परमावशयक है।
चींटी भी जिये हाथी भी जिये
भू-गोद बनी है सबके लिये।
मैं भी जी लूँ तुम, वह जी ले
सबका हक रौशन दीये जले।
डा0 चन्द्रमणि.

Friday, 27 January 2012

वीणावादिनी ....

मंजुलतम स्वर वीणावादिनि वागीश्वरि हम काक समान
सर्वमयी स्वच्छन्द विहारिणि दिशाहीन हम छी अनजान ।

हंसासन पद्मासन शोभित श्वेताम्बर कर सर्व विधान
आदिशक्ति मणिमालधारिणी ग्यान-भवन सर्वग्य महान ।

विश्वमोहिनी ग्यान प्रदायिनि हमरा नहि अछि ग्यानक भान
ज्योतिर्मय पथ देखा दिअ मा दिअ बुद्धि विद्या वरदान ।

हे महिमामय सरस्वती मा हम मतिमन्द महा अग्यान
हम करबद्ध मूक छी जड़वत् छी अक्षम गाबी कोन गान ।

डा0 चन्द्रमणि.

Tuesday, 24 January 2012

Gyaan pipaasa.

Main apne mitron se nishchhal dil kee baat karna chaahta hoon : Hamara desh Bharat mahan hai.Hamare paas Eeshwar se saakshaatkar karaane ke liye Shri Ramcharit Maanas aur Shrimad Bhagwadgeeta jaise mahaan pathpradarshak granth hain.Lokachar aur aadhyatmik gyaan ke liye inse bare koi guru nahi ho sakte.Yaa to ham inhe parhte nahi yaa parhkar amal nahi karte.In Mahan granthon ke rahte hamen kisi sant-fakeer ke peechhe bhagne kee jaroorat nahi hai.Ye inhi grantho ko parhkar gyaanarjan karte hain.Koi padaishee guru nahi hote.Bas anter ye hota ki ye sant-fakeer in granthon ko parhkar iska prachar karte.Is se unka bhee kalyan hota hai aur aapko apna karm yaad bhee aata hai.
Mere vichar me ham jab Santon ke saath dikhte hain to Hindu, Fakeeron ke saath hote hain to Muslim maansikta ko tusht karne kee koshish karte hain.
Kuchh log aise bhee deekhte hain jinhe maatra janta ke dukh-dardon ko sunne aur khetra kee samasyaon ke samadhan ke liye vyast rahne ke kaaran doosree baaton se koi matlab nahin rahta.Yahi inka dharm,yahi inkee pooja hai.Ham kyon nahin aise karmath samarpit purushon kee jaikar karen.Desh ko aise hi sapooton kee jaroorat hai.

Thursday, 12 January 2012

प्रवासी पूत सँ....

घुरि आउ ब्राह्मण !
जातीय गणितक निष्कर्ष,
संपूर्ण शरीरक उत्कर्ष,
ब्र्ह्माण्डक ब्रह्म,
ज्ञानक उद्गम
सृष्टिक संस्कार,
आचार विचार,
सदाचारक साक्षात् स्वरुप सच्चिदानन्द,
घुरि आउ ब्राह्मण !
सहि नहि सकलहुँ उपेक्षा,
पड़ा गेलहुँ परदेश ।
हृदय में उभरल होयत टीस,
अव्यक्त असहनीय कलेश ।
घुरि आउ ब्राह्मण !
बड़ निम्मन अछि
अप्पन माटि पानि सोना सन देश ।
प्राण सदृश पुत्रक पलायन सँ मर्माहत ,
कुहरि जाइछ ममता आ बापक दुलार,
निर्बल हो भाय आ बहिनक भरोसा,
धुमिल परिवेश होइछ घुप-घुप अन्हार ।
पहिने सँ परिचित छी अहाँक सहिष्णुता सँ,
निर्मल कोमल उदार प्रेम उष्णता सँ।
अहाँ सुनबैत छलहुँ परिभाषा-
विप्रक अर्थ व्यापक अछि-
जे विशेष प्रज्ञ परम ज्ञानी
धीर गंभीर स्वाभिमानी
सएह थिक विप्र ।
भूगोल सन छोरहीन
जाति वर्ग भेद सँ फराक
सरस्वतीक साधक
निज मातृभूमि आराधक
घुरि आउ ब्राह्मण !
कतेक चोट पहुँचल
जे भए गेलहुँ अधीर ।
अहाँक दु:ख सुननिहार
बाँचल नहि केओ छल
कोनाके भरि गाम भेल छल बहीर ?
घुरि आउ ब्रह्मण !
घुरल ई बसात
सेनुरायल साँझ आ सिनुरिया प्रात ।
बेली-चमेली में नवल प्राण एलैये
घासक हरियरी बाँस चढि गेलैये।
गामहुमे गेनमा अंग्रेजी पढैत अछि
गामक किसुनमा त क्रिकेटक चैंपियन
नगरक जुअनकाके छक्का छोड़बैत अछि।
डाक्टर अभियंता कलक्टर
बनि रहलैये
प्रवासी पंडित सब
गाम घुरि रहलैये।
अहाँ सनक बेटा
प्रदेशक धरोहर अछि
देशक गुमान
विकासक सहोदर अछि।
चौकस रखवार
उपजा यथेष्ट ,
आगाँ बढैक लेल
सब केओ सचेष्ट ।
पछियाक झड़की सं हमहुँ बचैत छी
पूर्वजक देल पीताम्बर ओढ़ैत छी।
घुरि आउ ब्राह्मण!
जननी आ जन्मभूमि
स्वर्गोपम घोषित यै ।
आबि करू सेवा
मेवाक ढेर छै
ईश्वर घर देर
नहि सदिखन अन्हेर छै।
अहाँ रहब गाम
हमर अन्न कियै आन खैत
पुरिबाक हल्फी मे
भरि पोख नींद हैत
मातृभूमिक सेवा
कथमपि नहि व्यर्थ जैत।
घुरि आउ ब्राह्मण !

Monday, 2 January 2012

Monak baat:

Foresightedness.

A poor patriotic servant went to the king and prayed for having chances to serve him.The king was shuddered from fear and replied"Do not you want to be a part of our kingship"? Next time,An insurgent servant prayed to the king to entrust him higher service and provide him 500 stronger armies to finish the enemy.The king was hypnotized to see the patriotism of the cunning fellow.This servant was made the commander of the army.It was disastrous,the king was ruined and the kingdom was overpowered.It happens when the king loses the foresight.