घुरि आउ ब्राह्मण !
जातीय गणितक निष्कर्ष,
संपूर्ण शरीरक उत्कर्ष,
ब्र्ह्माण्डक ब्रह्म,
ज्ञानक उद्गम
सृष्टिक संस्कार,
आचार विचार,
सदाचारक साक्षात् स्वरुप सच्चिदानन्द,
घुरि आउ ब्राह्मण !
सहि नहि सकलहुँ उपेक्षा,
पड़ा गेलहुँ परदेश ।
हृदय में उभरल होयत टीस,
अव्यक्त असहनीय कलेश ।
घुरि आउ ब्राह्मण !
बड़ निम्मन अछि
अप्पन माटि पानि सोना सन देश ।
प्राण सदृश पुत्रक पलायन सँ मर्माहत ,
कुहरि जाइछ ममता आ बापक दुलार,
निर्बल हो भाय आ बहिनक भरोसा,
धुमिल परिवेश होइछ घुप-घुप अन्हार ।
पहिने सँ परिचित छी अहाँक सहिष्णुता सँ,
निर्मल कोमल उदार प्रेम उष्णता सँ।
अहाँ सुनबैत छलहुँ परिभाषा-
विप्रक अर्थ व्यापक अछि-
जे विशेष प्रज्ञ परम ज्ञानी
धीर गंभीर स्वाभिमानी
सएह थिक विप्र ।
भूगोल सन छोरहीन
जाति वर्ग भेद सँ फराक
सरस्वतीक साधक
निज मातृभूमि आराधक
घुरि आउ ब्राह्मण !
कतेक चोट पहुँचल
जे भए गेलहुँ अधीर ।
अहाँक दु:ख सुननिहार
बाँचल नहि केओ छल
कोनाके भरि गाम भेल छल बहीर ?
घुरि आउ ब्रह्मण !
घुरल ई बसात
सेनुरायल साँझ आ सिनुरिया प्रात ।
बेली-चमेली में नवल प्राण एलैये
घासक हरियरी बाँस चढि गेलैये।
गामहुमे गेनमा अंग्रेजी पढैत अछि
गामक किसुनमा त क्रिकेटक चैंपियन
नगरक जुअनकाके छक्का छोड़बैत अछि।
डाक्टर अभियंता कलक्टर
बनि रहलैये
प्रवासी पंडित सब
गाम घुरि रहलैये।
अहाँ सनक बेटा
प्रदेशक धरोहर अछि
देशक गुमान
विकासक सहोदर अछि।
चौकस रखवार
उपजा यथेष्ट ,
आगाँ बढैक लेल
सब केओ सचेष्ट ।
पछियाक झड़की सं हमहुँ बचैत छी
पूर्वजक देल पीताम्बर ओढ़ैत छी।
घुरि आउ ब्राह्मण!
जननी आ जन्मभूमि
स्वर्गोपम घोषित यै ।
आबि करू सेवा
मेवाक ढेर छै
ईश्वर घर देर
नहि सदिखन अन्हेर छै।
अहाँ रहब गाम
हमर अन्न कियै आन खैत
पुरिबाक हल्फी मे
भरि पोख नींद हैत
मातृभूमिक सेवा
कथमपि नहि व्यर्थ जैत।
घुरि आउ ब्राह्मण !
Chandramani jee ahak e kavita padhi ke mon karait achhi akhne trail pakri li aur delhi pradesh ke tyagi di, ahak kavita ke varnan karwak lel hamra lag sabd nahi achhi, tahi le maphi chahait chhi.
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