बसता मेरी निगाह मे शाकी का चेहरा
अबकी जो देखा मुसकुरा के ये हुई न बात।
अनकही अदा ने बयाँ कर दी बहुत कुछ
दाँतों में ऊँगलियाँ दबाके ये हुई न बात।
सपनों की मल्लिका के ख़यालों में जो भी था
उनकी तो आँखें मुझसे लड़ी़ ये हुई न बात।
उनकी जुबाँ थी बन्द मैं भी बोल न सका
लम्बी खींची थीं साँसें उनकी ये हुई न बात।
हर चार कदम चलके दुपट्टा संभालती
बौराई हवा छेड़ गई ये हुई न बात।
वो जा रही थी जैसे मुझे जानती नहीं
झटके से मुड़के देख लिया ये हुई न बात।
कुछ शुक्र है ख़ुदा का सुकूँ मुझको भी मिला
चाहत ने चाहा 'चन्द्रमणि' ये हुई न बात ।।
डा0 चन्द्रमणि.
Thursday, 5 April 2012
Monday, 2 April 2012
पियाजी सयान डा0चन्द्रमणि
हमरो वारी उमेरिया पिया बड़ा रे सयान
हम त' लाजे भेलौं कठौत पिया मारय नैन वाण ।
बाबाक अंगना मे बेली फुलयलइ
नचिते गबिते भमरा अयलइ
लागि गेलइ पहरा पिया कप्तान..हमरो वारी...
अम्माक अंगना मे हम त' खेललियइ
प्रेमक मंतर किछु ने जनलियइ
हृदय लगाय पिया मारय मुसकान..हमरो वारी...
पड़िते सेनुर कोना पलटल पाशा
छलियइ धिया पुता भेलियइ तमाशा
पियाजीक पिंजड़ा मे सुगियाक जान..हमरो..
कोरा कागत हम बपदुलरी
पीअर दप दप हमरोके चुनरी
लागि गेल दाग पिया खाय मोर पान..
हमरो वारी उमेरिया पिया बड़ा रे सयान ।।
( ई गीत मुजप्फरपुर दूरदर्शन सं चन्द्रेश्वर गायक के आवाज मे
दर्जनो बेर प्रसारित भेल अछि।गीतक अर्थ प्रेम सं लगाओल जाय, हड़बड़ी मे नहि)
हम त' लाजे भेलौं कठौत पिया मारय नैन वाण ।
बाबाक अंगना मे बेली फुलयलइ
नचिते गबिते भमरा अयलइ
लागि गेलइ पहरा पिया कप्तान..हमरो वारी...
अम्माक अंगना मे हम त' खेललियइ
प्रेमक मंतर किछु ने जनलियइ
हृदय लगाय पिया मारय मुसकान..हमरो वारी...
पड़िते सेनुर कोना पलटल पाशा
छलियइ धिया पुता भेलियइ तमाशा
पियाजीक पिंजड़ा मे सुगियाक जान..हमरो..
कोरा कागत हम बपदुलरी
पीअर दप दप हमरोके चुनरी
लागि गेल दाग पिया खाय मोर पान..
हमरो वारी उमेरिया पिया बड़ा रे सयान ।।
( ई गीत मुजप्फरपुर दूरदर्शन सं चन्द्रेश्वर गायक के आवाज मे
दर्जनो बेर प्रसारित भेल अछि।गीतक अर्थ प्रेम सं लगाओल जाय, हड़बड़ी मे नहि)
हम गुलाब केर फूल डा0 चन्द्रमणि
हम वसंत ऋतु अहाँ पवन बनि आउ ने
हम गुलाब केर फूल पिया दुलराउ ने ।
छी दूर जाय बैसल पागल बनल यै मौसम
पढ़लौं ने प्रेम आखर त' सब बेकार प्रीतम
अर्थक जोड़ घटाउ छोड़ि घर आउ ने...हम गुलाब केर फूल...
बेदर्द छइ जमाना ने प्रीत रीत जानय
दोसर के नीक धन के बरबस अपनहि मानय
छी सुकुमारि सिनेह सुधा बरिसाउ ने...हम गुलाब केर फूल..
खुलिके हँसइ छी कनिये होइते रहैये मोसकिल
की भान करय भमरा अपने अहाँ छी काबिल
बनि प्रेमक बदरा बरसिये जाउ ने
हम गुलाब केर फूल पिया दुलराउ ने ।।
डा0 चन्द्रमणि.
हम गुलाब केर फूल पिया दुलराउ ने ।
छी दूर जाय बैसल पागल बनल यै मौसम
पढ़लौं ने प्रेम आखर त' सब बेकार प्रीतम
अर्थक जोड़ घटाउ छोड़ि घर आउ ने...हम गुलाब केर फूल...
बेदर्द छइ जमाना ने प्रीत रीत जानय
दोसर के नीक धन के बरबस अपनहि मानय
छी सुकुमारि सिनेह सुधा बरिसाउ ने...हम गुलाब केर फूल..
खुलिके हँसइ छी कनिये होइते रहैये मोसकिल
की भान करय भमरा अपने अहाँ छी काबिल
बनि प्रेमक बदरा बरसिये जाउ ने
हम गुलाब केर फूल पिया दुलराउ ने ।।
डा0 चन्द्रमणि.
Sunday, 1 April 2012
सीता शतक डा0 चन्द्रमणि.
सरस्वती वन्दना
कर वीणा पद्मासना सकल ज्ञान आगार
आदि शक्ति शुभदायिनी करिय नमन स्वीकार ।1।
गणेश वन्दना
जय गणेश गिरिजा तनय काव्य कला गुण धाम
सकल सिद्धि दाता प्रभु कोटि कोटि परनाम ।2।
शिव वन्दना
शशि शोभित जनि भाल पर सिर पर सुरसरि धार
कर त्रिशूल लय कष्ट हरू शिव करुणा अवतार ।3।
सीताराम वन्दना
जगदम्बा बनि जानकी मिथिला मे अवतार
राम रमापति "चन्द्रमणि" करु हमरहु भवपार ।4।
कथा
सिरमा मे गिरिराज अटल पदतल गंगाधार
बंग बाम गंडकी दहिन मिथिला मोक्षक द्वार।5।
पावन मिथिला देश मे निर्मित भेल अकाल
राज पुरोहित कहल तखन हर जोतथि महिपाल ।6।
जन गण केर दु:ख त्राण हित तत्पर जनक नरेश
हर सं जोतल खेत केँ हरलनि प्रजा कलेश ।7।
हर'क सिराउरि सँ प्रकट घट मे सीता अम्ब
बरिसल घन आनन्द केँ जयति जयति जगदम्ब ।8।
धन्य धरणि केर खणड ओ सीतामही विशेष
सीतामढ़ीक नाम सँ एखनहु नगर अशेष ।9।
घट केर आभा देखि केँ चकित सुनयना माय
झट सं शिशुकेँ कोर कय आँचर लेलनि समाय।10।
राक्षस कुल संहार हित अयला श्री भगवान
जनक सुता केर रूप सिया दशरथ सुत श्री राम।11।
जनम लेलनि जगदम्बिके मिथिला सन के आन
कुँज कुँज भरि गेल कुसुम सदा वसंत समान।12।
अवसर पुत्री जन्म केँ किंचित सुनइछ कान
हरखक पारावार नहि चहुँदिशि सोहर गान।13।
धन्य धन्य मिथिलापुरी धन्य जनकपुर धाम
जनक सुता पग पैजनी झंकृत वन पथ गाम।14।
सुखक समय गति तेज तेँ बीतल पलक समान
वर कनियां के खेल मे सीता भेलि सयान ।15।
पिता जनक ऋषि तुल्य गृह शिव धनु रहय जोगाय
नीपथि धनुतल नित्य सिया बामहि हाथ उठाय ।16।
नृप देखल ई दृश्य त' बड़ मन अचरज भेल
सीता केर पति होथि जे तोड़थि धनु व्रत लेल।17।
नंदन वन सन वाटिका सिया बहिनपा संग
गिरिजा पूजन हेतु सुमन तोड़थि रंग विरंग।18।
तखनहि अयला राम लखन अवसर बहुत विचारि
जनिक रूप छवि देखिकेँ हरखित सकल कुमारि।20।
राम मुग्ध सिय रूप पर सिया मुग्ध लखि राम
सुखक आगमन "चन्द्रमणि"फड़कनि वामा बाम।21।
मध्य नगर मिथिलेश के यज्ञभूमि निर्माण
शिवक धनुष भंजन करता जे अतिशय बलवान ।22।
टारि सकल नहि कत भंजन दस सहस्र नृप टोल
तोड़लनि शीश झुकाय धनुष रामक जय अनघोल।23।
सिया राम केँ पुनर्मिलन वरण कयल जयमाल
पुष्प वृष्टि कयलनि सुरगण दय दय नाँचथि ताल।24।
शेषासन केँ छोड़ि हरी अयला मिथिला द्वार
दीव्य भूमि पर विष्णु प्रिया स्वयं लेलनि अवतार।25।....क्रमश:......
डा0 चन्द्रमणि.
कर वीणा पद्मासना सकल ज्ञान आगार
आदि शक्ति शुभदायिनी करिय नमन स्वीकार ।1।
गणेश वन्दना
जय गणेश गिरिजा तनय काव्य कला गुण धाम
सकल सिद्धि दाता प्रभु कोटि कोटि परनाम ।2।
शिव वन्दना
शशि शोभित जनि भाल पर सिर पर सुरसरि धार
कर त्रिशूल लय कष्ट हरू शिव करुणा अवतार ।3।
सीताराम वन्दना
जगदम्बा बनि जानकी मिथिला मे अवतार
राम रमापति "चन्द्रमणि" करु हमरहु भवपार ।4।
कथा
सिरमा मे गिरिराज अटल पदतल गंगाधार
बंग बाम गंडकी दहिन मिथिला मोक्षक द्वार।5।
पावन मिथिला देश मे निर्मित भेल अकाल
राज पुरोहित कहल तखन हर जोतथि महिपाल ।6।
जन गण केर दु:ख त्राण हित तत्पर जनक नरेश
हर सं जोतल खेत केँ हरलनि प्रजा कलेश ।7।
हर'क सिराउरि सँ प्रकट घट मे सीता अम्ब
बरिसल घन आनन्द केँ जयति जयति जगदम्ब ।8।
धन्य धरणि केर खणड ओ सीतामही विशेष
सीतामढ़ीक नाम सँ एखनहु नगर अशेष ।9।
घट केर आभा देखि केँ चकित सुनयना माय
झट सं शिशुकेँ कोर कय आँचर लेलनि समाय।10।
राक्षस कुल संहार हित अयला श्री भगवान
जनक सुता केर रूप सिया दशरथ सुत श्री राम।11।
जनम लेलनि जगदम्बिके मिथिला सन के आन
कुँज कुँज भरि गेल कुसुम सदा वसंत समान।12।
अवसर पुत्री जन्म केँ किंचित सुनइछ कान
हरखक पारावार नहि चहुँदिशि सोहर गान।13।
धन्य धन्य मिथिलापुरी धन्य जनकपुर धाम
जनक सुता पग पैजनी झंकृत वन पथ गाम।14।
सुखक समय गति तेज तेँ बीतल पलक समान
वर कनियां के खेल मे सीता भेलि सयान ।15।
पिता जनक ऋषि तुल्य गृह शिव धनु रहय जोगाय
नीपथि धनुतल नित्य सिया बामहि हाथ उठाय ।16।
नृप देखल ई दृश्य त' बड़ मन अचरज भेल
सीता केर पति होथि जे तोड़थि धनु व्रत लेल।17।
नंदन वन सन वाटिका सिया बहिनपा संग
गिरिजा पूजन हेतु सुमन तोड़थि रंग विरंग।18।
तखनहि अयला राम लखन अवसर बहुत विचारि
जनिक रूप छवि देखिकेँ हरखित सकल कुमारि।20।
राम मुग्ध सिय रूप पर सिया मुग्ध लखि राम
सुखक आगमन "चन्द्रमणि"फड़कनि वामा बाम।21।
मध्य नगर मिथिलेश के यज्ञभूमि निर्माण
शिवक धनुष भंजन करता जे अतिशय बलवान ।22।
टारि सकल नहि कत भंजन दस सहस्र नृप टोल
तोड़लनि शीश झुकाय धनुष रामक जय अनघोल।23।
सिया राम केँ पुनर्मिलन वरण कयल जयमाल
पुष्प वृष्टि कयलनि सुरगण दय दय नाँचथि ताल।24।
शेषासन केँ छोड़ि हरी अयला मिथिला द्वार
दीव्य भूमि पर विष्णु प्रिया स्वयं लेलनि अवतार।25।....क्रमश:......
डा0 चन्द्रमणि.
हे सजनी ! डा0 चन्द्रमणि
चोरी चोरी नैन नचाक' चुप्पा वाण चलाबइ छी
अंग अंग मे रंग सातटा पनिशोखा बनि आबइ छी
खने उगइ छी खने डुबइ छी कियै एना तरसाबइ छी हे सजनी....
अहाँ हँसइ छी कते तरेगण दोगे दोग नुकाइये
देखि अहाँके हमरा मन मे सिंगरहार छिड़िआइये
गुनगुनाइत छी पंचम सुर मे कोइली के भरमाबइ छी...खने उगइ छी..
दर्पण के जुनि देखू ओ त' अपनहि बहुत लजायल ये
देखू हमरे आँखि मे सजनी रूप अहींक समायल ये
कतेक दुलारू भेल दुपट्टा मुँह पोछि बहसाबइ छी ....खने उगइ छी..
एलइ वसंत अलि संग कंत छइ दुनिया ई रंगीन कते
अहूँ बुझइ छी मोने मोने हम करइत छी प्रेम जते
लाज छोड़िके बाँहि पसारू जिनगी कियै गमाबइ छी....खने उगइ छी..
डा0 चन्द्रमणि.
अंग अंग मे रंग सातटा पनिशोखा बनि आबइ छी
खने उगइ छी खने डुबइ छी कियै एना तरसाबइ छी हे सजनी....
अहाँ हँसइ छी कते तरेगण दोगे दोग नुकाइये
देखि अहाँके हमरा मन मे सिंगरहार छिड़िआइये
गुनगुनाइत छी पंचम सुर मे कोइली के भरमाबइ छी...खने उगइ छी..
दर्पण के जुनि देखू ओ त' अपनहि बहुत लजायल ये
देखू हमरे आँखि मे सजनी रूप अहींक समायल ये
कतेक दुलारू भेल दुपट्टा मुँह पोछि बहसाबइ छी ....खने उगइ छी..
एलइ वसंत अलि संग कंत छइ दुनिया ई रंगीन कते
अहूँ बुझइ छी मोने मोने हम करइत छी प्रेम जते
लाज छोड़िके बाँहि पसारू जिनगी कियै गमाबइ छी....खने उगइ छी..
डा0 चन्द्रमणि.
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