चोरी चोरी नैन नचाक' चुप्पा वाण चलाबइ छी
अंग अंग मे रंग सातटा पनिशोखा बनि आबइ छी
खने उगइ छी खने डुबइ छी कियै एना तरसाबइ छी हे सजनी....
अहाँ हँसइ छी कते तरेगण दोगे दोग नुकाइये
देखि अहाँके हमरा मन मे सिंगरहार छिड़िआइये
गुनगुनाइत छी पंचम सुर मे कोइली के भरमाबइ छी...खने उगइ छी..
दर्पण के जुनि देखू ओ त' अपनहि बहुत लजायल ये
देखू हमरे आँखि मे सजनी रूप अहींक समायल ये
कतेक दुलारू भेल दुपट्टा मुँह पोछि बहसाबइ छी ....खने उगइ छी..
एलइ वसंत अलि संग कंत छइ दुनिया ई रंगीन कते
अहूँ बुझइ छी मोने मोने हम करइत छी प्रेम जते
लाज छोड़िके बाँहि पसारू जिनगी कियै गमाबइ छी....खने उगइ छी..
डा0 चन्द्रमणि.
No comments:
Post a Comment