Monday, 2 April 2012

हम गुलाब केर फूल डा0 चन्द्रमणि

हम वसंत ऋतु अहाँ पवन बनि आउ ने
हम गुलाब केर फूल पिया दुलराउ ने ।
छी दूर जाय बैसल पागल बनल यै मौसम
पढ़लौं ने प्रेम आखर त' सब बेकार प्रीतम
अर्थक जोड़ घटाउ छोड़ि घर आउ ने...हम गुलाब केर फूल...
बेदर्द छइ जमाना ने प्रीत रीत जानय
दोसर के नीक धन के बरबस अपनहि मानय
छी सुकुमारि सिनेह सुधा बरिसाउ ने...हम गुलाब केर फूल..
खुलिके हँसइ छी कनिये होइते रहैये मोसकिल
की भान करय भमरा अपने अहाँ छी काबिल
बनि प्रेमक बदरा बरसिये जाउ ने
हम गुलाब केर फूल पिया दुलराउ ने ।।
डा0 चन्द्रमणि.

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