आया वसंत भमरे गुन-गुन
दुबका सा कल रोया गुमसुम।
बस,दृष्टि मिली पथ नहीं मिला
यह पौद बाग का नहीं खिला ।
प्राची में दिनकर नित्य उगे
नभ चढे धरा पर नहीं झुके ।
बटवृक्ष खड़ा यह बड़ा बड़ा
इसकी छाया में पौद पड़ा ।
रवि-रशमि को शिशु रोता ही रहा
तरू की छाया से ढका रहा ।
सिर पर वट तरू तो खैर कहां
नभ दूर यहाँ रवि दूर वहाँ।
पा नहीं सका ऊर्जा यह पौद
इसको तो कोई गया रौद।
यह बागवान की चूक भी है
ऊपर तकने की भूख भी है।
सिर झुका देखता नींचा जो
दम तोड़ नहीं रहता यह तो।
कल की भी परख आवश्यक है
आजादी परमावशयक है।
चींटी भी जिये हाथी भी जिये
भू-गोद बनी है सबके लिये।
मैं भी जी लूँ तुम, वह जी ले
सबका हक रौशन दीये जले।
डा0 चन्द्रमणि.
Saturday, 28 January 2012
Friday, 27 January 2012
वीणावादिनी ....
मंजुलतम स्वर वीणावादिनि वागीश्वरि हम काक समान
सर्वमयी स्वच्छन्द विहारिणि दिशाहीन हम छी अनजान ।
हंसासन पद्मासन शोभित श्वेताम्बर कर सर्व विधान
आदिशक्ति मणिमालधारिणी ग्यान-भवन सर्वग्य महान ।
विश्वमोहिनी ग्यान प्रदायिनि हमरा नहि अछि ग्यानक भान
ज्योतिर्मय पथ देखा दिअ मा दिअ बुद्धि विद्या वरदान ।
हे महिमामय सरस्वती मा हम मतिमन्द महा अग्यान
हम करबद्ध मूक छी जड़वत् छी अक्षम गाबी कोन गान ।
डा0 चन्द्रमणि.
सर्वमयी स्वच्छन्द विहारिणि दिशाहीन हम छी अनजान ।
हंसासन पद्मासन शोभित श्वेताम्बर कर सर्व विधान
आदिशक्ति मणिमालधारिणी ग्यान-भवन सर्वग्य महान ।
विश्वमोहिनी ग्यान प्रदायिनि हमरा नहि अछि ग्यानक भान
ज्योतिर्मय पथ देखा दिअ मा दिअ बुद्धि विद्या वरदान ।
हे महिमामय सरस्वती मा हम मतिमन्द महा अग्यान
हम करबद्ध मूक छी जड़वत् छी अक्षम गाबी कोन गान ।
डा0 चन्द्रमणि.
Tuesday, 24 January 2012
Gyaan pipaasa.
Main apne mitron se nishchhal dil kee baat karna chaahta hoon : Hamara desh Bharat mahan hai.Hamare paas Eeshwar se saakshaatkar karaane ke liye Shri Ramcharit Maanas aur Shrimad Bhagwadgeeta jaise mahaan pathpradarshak granth hain.Lokachar aur aadhyatmik gyaan ke liye inse bare koi guru nahi ho sakte.Yaa to ham inhe parhte nahi yaa parhkar amal nahi karte.In Mahan granthon ke rahte hamen kisi sant-fakeer ke peechhe bhagne kee jaroorat nahi hai.Ye inhi grantho ko parhkar gyaanarjan karte hain.Koi padaishee guru nahi hote.Bas anter ye hota ki ye sant-fakeer in granthon ko parhkar iska prachar karte.Is se unka bhee kalyan hota hai aur aapko apna karm yaad bhee aata hai.
Mere vichar me ham jab Santon ke saath dikhte hain to Hindu, Fakeeron ke saath hote hain to Muslim maansikta ko tusht karne kee koshish karte hain.
Kuchh log aise bhee deekhte hain jinhe maatra janta ke dukh-dardon ko sunne aur khetra kee samasyaon ke samadhan ke liye vyast rahne ke kaaran doosree baaton se koi matlab nahin rahta.Yahi inka dharm,yahi inkee pooja hai.Ham kyon nahin aise karmath samarpit purushon kee jaikar karen.Desh ko aise hi sapooton kee jaroorat hai.
Mere vichar me ham jab Santon ke saath dikhte hain to Hindu, Fakeeron ke saath hote hain to Muslim maansikta ko tusht karne kee koshish karte hain.
Kuchh log aise bhee deekhte hain jinhe maatra janta ke dukh-dardon ko sunne aur khetra kee samasyaon ke samadhan ke liye vyast rahne ke kaaran doosree baaton se koi matlab nahin rahta.Yahi inka dharm,yahi inkee pooja hai.Ham kyon nahin aise karmath samarpit purushon kee jaikar karen.Desh ko aise hi sapooton kee jaroorat hai.
Thursday, 12 January 2012
प्रवासी पूत सँ....
घुरि आउ ब्राह्मण !
जातीय गणितक निष्कर्ष,
संपूर्ण शरीरक उत्कर्ष,
ब्र्ह्माण्डक ब्रह्म,
ज्ञानक उद्गम
सृष्टिक संस्कार,
आचार विचार,
सदाचारक साक्षात् स्वरुप सच्चिदानन्द,
घुरि आउ ब्राह्मण !
सहि नहि सकलहुँ उपेक्षा,
पड़ा गेलहुँ परदेश ।
हृदय में उभरल होयत टीस,
अव्यक्त असहनीय कलेश ।
घुरि आउ ब्राह्मण !
बड़ निम्मन अछि
अप्पन माटि पानि सोना सन देश ।
प्राण सदृश पुत्रक पलायन सँ मर्माहत ,
कुहरि जाइछ ममता आ बापक दुलार,
निर्बल हो भाय आ बहिनक भरोसा,
धुमिल परिवेश होइछ घुप-घुप अन्हार ।
पहिने सँ परिचित छी अहाँक सहिष्णुता सँ,
निर्मल कोमल उदार प्रेम उष्णता सँ।
अहाँ सुनबैत छलहुँ परिभाषा-
विप्रक अर्थ व्यापक अछि-
जे विशेष प्रज्ञ परम ज्ञानी
धीर गंभीर स्वाभिमानी
सएह थिक विप्र ।
भूगोल सन छोरहीन
जाति वर्ग भेद सँ फराक
सरस्वतीक साधक
निज मातृभूमि आराधक
घुरि आउ ब्राह्मण !
कतेक चोट पहुँचल
जे भए गेलहुँ अधीर ।
अहाँक दु:ख सुननिहार
बाँचल नहि केओ छल
कोनाके भरि गाम भेल छल बहीर ?
घुरि आउ ब्रह्मण !
घुरल ई बसात
सेनुरायल साँझ आ सिनुरिया प्रात ।
बेली-चमेली में नवल प्राण एलैये
घासक हरियरी बाँस चढि गेलैये।
गामहुमे गेनमा अंग्रेजी पढैत अछि
गामक किसुनमा त क्रिकेटक चैंपियन
नगरक जुअनकाके छक्का छोड़बैत अछि।
डाक्टर अभियंता कलक्टर
बनि रहलैये
प्रवासी पंडित सब
गाम घुरि रहलैये।
अहाँ सनक बेटा
प्रदेशक धरोहर अछि
देशक गुमान
विकासक सहोदर अछि।
चौकस रखवार
उपजा यथेष्ट ,
आगाँ बढैक लेल
सब केओ सचेष्ट ।
पछियाक झड़की सं हमहुँ बचैत छी
पूर्वजक देल पीताम्बर ओढ़ैत छी।
घुरि आउ ब्राह्मण!
जननी आ जन्मभूमि
स्वर्गोपम घोषित यै ।
आबि करू सेवा
मेवाक ढेर छै
ईश्वर घर देर
नहि सदिखन अन्हेर छै।
अहाँ रहब गाम
हमर अन्न कियै आन खैत
पुरिबाक हल्फी मे
भरि पोख नींद हैत
मातृभूमिक सेवा
कथमपि नहि व्यर्थ जैत।
घुरि आउ ब्राह्मण !
जातीय गणितक निष्कर्ष,
संपूर्ण शरीरक उत्कर्ष,
ब्र्ह्माण्डक ब्रह्म,
ज्ञानक उद्गम
सृष्टिक संस्कार,
आचार विचार,
सदाचारक साक्षात् स्वरुप सच्चिदानन्द,
घुरि आउ ब्राह्मण !
सहि नहि सकलहुँ उपेक्षा,
पड़ा गेलहुँ परदेश ।
हृदय में उभरल होयत टीस,
अव्यक्त असहनीय कलेश ।
घुरि आउ ब्राह्मण !
बड़ निम्मन अछि
अप्पन माटि पानि सोना सन देश ।
प्राण सदृश पुत्रक पलायन सँ मर्माहत ,
कुहरि जाइछ ममता आ बापक दुलार,
निर्बल हो भाय आ बहिनक भरोसा,
धुमिल परिवेश होइछ घुप-घुप अन्हार ।
पहिने सँ परिचित छी अहाँक सहिष्णुता सँ,
निर्मल कोमल उदार प्रेम उष्णता सँ।
अहाँ सुनबैत छलहुँ परिभाषा-
विप्रक अर्थ व्यापक अछि-
जे विशेष प्रज्ञ परम ज्ञानी
धीर गंभीर स्वाभिमानी
सएह थिक विप्र ।
भूगोल सन छोरहीन
जाति वर्ग भेद सँ फराक
सरस्वतीक साधक
निज मातृभूमि आराधक
घुरि आउ ब्राह्मण !
कतेक चोट पहुँचल
जे भए गेलहुँ अधीर ।
अहाँक दु:ख सुननिहार
बाँचल नहि केओ छल
कोनाके भरि गाम भेल छल बहीर ?
घुरि आउ ब्रह्मण !
घुरल ई बसात
सेनुरायल साँझ आ सिनुरिया प्रात ।
बेली-चमेली में नवल प्राण एलैये
घासक हरियरी बाँस चढि गेलैये।
गामहुमे गेनमा अंग्रेजी पढैत अछि
गामक किसुनमा त क्रिकेटक चैंपियन
नगरक जुअनकाके छक्का छोड़बैत अछि।
डाक्टर अभियंता कलक्टर
बनि रहलैये
प्रवासी पंडित सब
गाम घुरि रहलैये।
अहाँ सनक बेटा
प्रदेशक धरोहर अछि
देशक गुमान
विकासक सहोदर अछि।
चौकस रखवार
उपजा यथेष्ट ,
आगाँ बढैक लेल
सब केओ सचेष्ट ।
पछियाक झड़की सं हमहुँ बचैत छी
पूर्वजक देल पीताम्बर ओढ़ैत छी।
घुरि आउ ब्राह्मण!
जननी आ जन्मभूमि
स्वर्गोपम घोषित यै ।
आबि करू सेवा
मेवाक ढेर छै
ईश्वर घर देर
नहि सदिखन अन्हेर छै।
अहाँ रहब गाम
हमर अन्न कियै आन खैत
पुरिबाक हल्फी मे
भरि पोख नींद हैत
मातृभूमिक सेवा
कथमपि नहि व्यर्थ जैत।
घुरि आउ ब्राह्मण !
Monday, 2 January 2012
Foresightedness.
A poor patriotic servant went to the king and prayed for having chances to serve him.The king was shuddered from fear and replied"Do not you want to be a part of our kingship"? Next time,An insurgent servant prayed to the king to entrust him higher service and provide him 500 stronger armies to finish the enemy.The king was hypnotized to see the patriotism of the cunning fellow.This servant was made the commander of the army.It was disastrous,the king was ruined and the kingdom was overpowered.It happens when the king loses the foresight.
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