मंजुलतम स्वर वीणावादिनि वागीश्वरि हम काक समान
सर्वमयी स्वच्छन्द विहारिणि दिशाहीन हम छी अनजान ।
हंसासन पद्मासन शोभित श्वेताम्बर कर सर्व विधान
आदिशक्ति मणिमालधारिणी ग्यान-भवन सर्वग्य महान ।
विश्वमोहिनी ग्यान प्रदायिनि हमरा नहि अछि ग्यानक भान
ज्योतिर्मय पथ देखा दिअ मा दिअ बुद्धि विद्या वरदान ।
हे महिमामय सरस्वती मा हम मतिमन्द महा अग्यान
हम करबद्ध मूक छी जड़वत् छी अक्षम गाबी कोन गान ।
डा0 चन्द्रमणि.
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