आया वसंत भमरे गुन-गुन
दुबका सा कल रोया गुमसुम।
बस,दृष्टि मिली पथ नहीं मिला
यह पौद बाग का नहीं खिला ।
प्राची में दिनकर नित्य उगे
नभ चढे धरा पर नहीं झुके ।
बटवृक्ष खड़ा यह बड़ा बड़ा
इसकी छाया में पौद पड़ा ।
रवि-रशमि को शिशु रोता ही रहा
तरू की छाया से ढका रहा ।
सिर पर वट तरू तो खैर कहां
नभ दूर यहाँ रवि दूर वहाँ।
पा नहीं सका ऊर्जा यह पौद
इसको तो कोई गया रौद।
यह बागवान की चूक भी है
ऊपर तकने की भूख भी है।
सिर झुका देखता नींचा जो
दम तोड़ नहीं रहता यह तो।
कल की भी परख आवश्यक है
आजादी परमावशयक है।
चींटी भी जिये हाथी भी जिये
भू-गोद बनी है सबके लिये।
मैं भी जी लूँ तुम, वह जी ले
सबका हक रौशन दीये जले।
डा0 चन्द्रमणि.
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