Thursday, 29 March 2012

षट्कोण. डा0 चन्द्रमणि.

निज राज-काज सं मतलब अछि बड़ नीक बात।
अप्पन बाड़ी-फुलवाड़ी संग
आंगन दलान मधुरिम बसात
के करत प्रश्न ?
पुरुखाक राज पएबाक हेतु
चाही संकुल संपूर्ण तंत्र
एकसर गुरुदेवहु छथि असक्क
आ' असहाय।
अछि गोलवृत्त सन सूर्य
ने कखनहु परिवर्तित
तेँ,शक्तिमान जीवनदाता।
आ'जकर गोलाई घटत बढत
खन हैत नतोदर उदरोन्नत
निज अस्तित्वहि पर अठबज्जर
नेंगराइत स्वयं चलि जैत
अमावश उदर मध्य।
तेँ छैक जरूरी
रहय वृत्त सदिखन अटूट
नहि टूट-फूट मंगलदायक
ई दु:खदायक।
छी देखि रहल-
जनकक संतति सबहक जुटान
बैसार भेल अछि गोल-गोल
मतभिन्न उदर सबहक दुगोल।
केओ छथि शीबू योगी सन
ई निर्विकार ओ भोगी सन
जे पाँडु, पड़ल छथि रोगी सन
बेटाक आस
छोड़थि निसास।
दू-दू टा भुज बिच अलग कोण
षट्कोण बनओलनि छ: टा जन
अप्पन मर्जी आ'अप्पन मन।
गति रहितनि रहितिथ गोलवृत्त
पग-पग पर बाधित भेलनि गति
बुझू दुर्गति।
जल अछि अथाह
नहि थाह कतहु सिंहासन केर
तैराक बिसरिके लक्ष्य
तकै छथि रेहु माँछ
पुच्छी में अगबे हैत काँट
स्वादहु कम्मे।
चाही सबकेँ बड़का मूड़ा
मन केर मनोरथ हो पूरा
दय रहल हथोरिया माँछ लेल
अनमोल खजाना बिसरि देल।
अछि यैह फर्क-
मैथिलजन आ'सेनाक बीच
जहिना नायक बिनु भीड़
कहाबैत'छि मेला
बस सैह थिकहुँ।
हमसब नहि छी भेड़िया धसान
विस्फोटित बम सन छितरायल
सबहक मुँह सबदिस बौरायल।
कतबहु अगुआ सेवथु मसान
धरना पेटकुनिया देल करथु
दुनिया ले' कहबथु महादेव
हमरा सबले' एहिना धनि सन।
मैथिल मनमऔजी रहल सदा
सेनापति सं भ'क' फराक
मनमत्त नाँच कय गरिथैया
सब फाँड़ बान्हि देखबैछ जोश
ओ कल्याणहि ओ मालकोश
मेला बिच गाओत अलग राग
जिनगी बीतल अछि खोंटि साग
मैथिल समाज!
आबहु त'जाग!!
आबहु त'जाग!!!

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