बसता मेरी निगाह मे शाकी का चेहरा
अबकी जो देखा मुसकुरा के ये हुई न बात।
अनकही अदा ने बयाँ कर दी बहुत कुछ
दाँतों में ऊँगलियाँ दबाके ये हुई न बात।
सपनों की मल्लिका के ख़यालों में जो भी था
उनकी तो आँखें मुझसे लड़ी़ ये हुई न बात।
उनकी जुबाँ थी बन्द मैं भी बोल न सका
लम्बी खींची थीं साँसें उनकी ये हुई न बात।
हर चार कदम चलके दुपट्टा संभालती
बौराई हवा छेड़ गई ये हुई न बात।
वो जा रही थी जैसे मुझे जानती नहीं
झटके से मुड़के देख लिया ये हुई न बात।
कुछ शुक्र है ख़ुदा का सुकूँ मुझको भी मिला
चाहत ने चाहा 'चन्द्रमणि' ये हुई न बात ।।
डा0 चन्द्रमणि.
Thank you Dr. Chandramani for your comment on my short story "Urmila". It will definitely boost my enthusiasm and I will be able to write more and better.
ReplyDeleteSincerely,
Dr. Padmanabh Mishra